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Monday, September 24, 2018

रंगमंच की परछाई

रंगमंच की परछाई
वर्षो से सुना करते थे की जीवन रंगमंच हैं |
अब जाके पता चला की यह कितना सत्य हैं ||

हम सब तो शायद कहानी के किरदार भर हैं |
लेखक की लेखनी के हम मोहताज भर हैं ||

क्या कभी हम आपने आपको जी पाएंगे ?
या हमेशा लेखक की बाट जोहते जायेंगे ||

क्यों हमें हमेशा एक किरदार बनना पड़ता हैं ?
ना चाहते हुए भी रंगमंच का भाग बनना पड़ता हैं ||

हमारी हस्ती शायद हस्ती नहीं हैं बस एक परछाई भर हैं |
शायद अभिशप्त हैं हम सब रोशनी के लिए ||

क्यों हम स्वछंद नहीं हैं उन परिंदों की तरह ?
जो बेखौफ उचाई नापते हैं आसमान की ||

हमें हमारा किरदार कब छोड़ेगा |
कब हमारा अपना आसमान होगा ||

कब हम किसी लेखनी के मोहताज नहीं होंगे |
कब हम इस रंगमंच पर किरदार नहीं होंगे ||
कब हम इस रंगमंच पर किरदार नहीं होंगे ||

बिन मौसम बरसात

बिन मौसम बरसात

क्यों अक्सर बिन मौसम बरसात मैं , 

लड़का लडकी भीग जातेहैं

भीगकर पुरानी झोपडी मैं शरण पाते हैं

झोपडी मैं अक्सर माचिस के साथ लकड़ियाँ होती हैं , 

और एककनस्तर मैं किरासीन भी होती हैं

अक्सर एक कम्बल भी मिल जाता हैं, 

और बिजली चमकने सेयुगल जोड़ा पास आ जाता हैं

फिर मधिम रोशनी मैं संगीत का जनम होता हैं, 

और कैमरालालटेन को कवर किये रहता हैं

रंगीन रात के बाद सुबह अक्सर हसीन होती हैं ||

अक्सर मेले मैं खोये हुए दो भाई,

इकीस साल बाद मिलते हैं, 

और सगे बच्चे अक्सर अमर, अकबर, अन्थोनी बनते हैं

नायक का बाप अक्सर अमीर होता हैं, 

तो नायिका को झोपड़ानसीब होता हैं

फिर भी अक्सर नायिका दीजानर ड्रेस पहेनती हैं, 

और नायककी माँ निरूपा राय होती हैं

अक्सर जुएँ घर मैं पचीस पैसे करोड़ बन जाते हैं , 

करोडपति फैक्ट्री की आग मैं रोडपति बन जाते हैं

ओपरशन थेटर मैं डाक्टर अक्सर आइ ऍम सारी बोलता हैं, 

और हीरो फुर्ती से उठ कर खड़ा हो जाता हैं

चार आदमी एक गोली से अक्सर मारे जाते हैं , 

और घूसे से लोहे के मोटे दरवाजे अक्सर टेड़े हो जाते हैं

रिवाल्वर मैं गोलियां अनगिनत होती हैं , 

कीलइमअक्स मैं जीपोंकी जमपईग होती हैं

वो कुम्भ के मेले मैं बिछुड़े हुए भाई 

कीलइमअक्स मैं मिलते हैं

मोना के संग माइकल अक्सर होते हैं

जीवन चक्र 

जीवन चक्र 

सूर्य जब उदय हुआ 

जीवन सक्रीय हो उठा 

सूर्य जब अस्त हुआ 

जीवन निष्क्रिय हो गया 

उदय अस्त के इस क्रम में 

जीवन का सब सार छुपा 

पाप पुर्ण की व्यथा छुपी 

धर्म -अधर्म का मार्ग छुपा

समझो तो यही स्वर्ग हैं 

समझो तो यही नर्क हैं 

कर्मों की कहानी मैं 

जीवन का सारांश छुपा 

कथा कर्म की इतनी हैं 

सुख दुख सी यह अपनी हैं 

अपने कर्मों की करनी 

इस जीवन ही मैं भरनी हैं 

सूखता दरख़्त 

सूखता दरख़्त 

जब भी उस सूखते दरख़्त को देखता हूँ , गुजरा हुआ कल यादआता हैं 

जिसकी वक़्त गुजरने के साथ, जमी मैं और धसती जा रही हैंजड़े 

जिन्दगीयों के खुशहाल वक़्त भी देखे थे उसने, जब हर शाख पेपरिंदों के घरोंदे थे

तब ना जाने कितने अंधड़ आये और साथ मैं बेहिस्साबबिजलियाँ लाये 

सैलानी इतने रुके की जिनकी गिनती  नहीं 

उस वक़्त आशिकों ने भी जरे जरे पर अपनी आशिकी केअफसाने लिख दिए थे
तबके कई शायरो की रोटी का बंदोबस्त हो गया था 

कई मेलों के रससो को उसने थमा था, कई नुमाइशओ मैं अपनावजूद दिखाया था 

फिर वक़्त के साथ फिजा भी बदलने लगी, घरोंदे गिरे, पतियागिरी और तहनिया भी गिर गयी 

दरख़्त जितना जमी मैं जमा था उतना ही तनकर ऊपर खड़ा था

पर इतनी बड़ी हस्ती भी उसे बचा ना पाई, एक हल्की हवा कीलहर उसकी मौत लेके आयी 

आज उसका कुछ हिस्सा खिड़की बना हैं, और बाकी पड़ा वहीजमी बन रहा हैं

टूटी तस्वीर

टूटी तस्वीर

मैं कमरे मैं बैठा टूटी तस्वीर के शीशों को जोड़ रहा था 

की ना जाने कहा से एक कांच का टुकड़ा नश्तर बनके चुभ गया

जीवन पल भर को दर्द के इर्द गिर्द सिमट के रह गया
कुछ याद ना रहा खून बहता गया दर्द होता गया
यह दर्द का एहसास शायद जरूरी था जिन्दगी मैं

वो तस्वीर का शीशा शायद हवा के तेज झोंके से गिरके टूटा था
तस्वीर भी शायद मेरी ही थी जो धुल की एक मैली सी मटमैलीपरत से धुंदली दिखाई दे रही थी 

तस्वीर का कागज भी कुछ पीला सा बदरंग हो गया था

और फ्रेम की लकड़ी का गलना भी शुरू हो गया था

मुझे ठीक से याद नहीं वो कब की छवि थी

शायद मेरे गुजरे दोर की थी, 

आजकी तस्वीर उस पीले कागज़ पर उकेरी लकीरों से जुदा थी

पता नहीं वोह भोली सी मासूमियत कहा धुल मैं मिल गयी हैंआजकी तस्वीर मैं

Tuesday, September 18, 2018

आधी अधूरी

मद्धिम से स्याह होती निशा निश्चित ही मादक हवाओं के साथ और गहरी और काली होती जायेगी। 
दिनभर मानसूनी बादलों के साथ अठखेलियाँ करती हुई हवा रात होते होते आसक्त अतृप्त बस भटकी हैं। 
अब पलों का कोलाहल शांत हैं। हवा उन्मुक्त, आच्छादित, स्वछंद स्वयं कोलाहित हैं।

स्पर्श को व्याकुल अधर, कुछ सकुचाये हुए
अज्ञात अभिव्यक्ति की आस में तन पसराये पड़ी हवा उठी यमुना किनारे।
सहसा झीनी चंद्रिमा आवरण से मुक्त हो बिखर गई शहर के निशाचरी रोशनी में।
कंक्रीट के बियाबानो में उलझी कसमसा रही हर तरफ रोशनी में नहा रही

भारत बंद - 10 सेप्टेंबर 2018

भारतबन्दी पेड़ पर
बैठे तोंद फुलाये
नीचे से दन दण्ड पड़े
गिरे पड़े छितराये
पप्पू मंत्र पढ़े जो सज्जन
मति खोये दुख पाये
आलू से सोना निकले
सब एम आर आई कनेक्ट हो जाये

अर्बन नक्सल की घरबंदी

घर पे ही नजरबंदी
बहुत खूब कोर्ट की तुकबंदी
मजेदारी और बढ़ी
जब सरकारी वकील साब
मुँह में दही जमा कर
शून्य ताकते खड़े राहिल
जरा छोटी सी चोरी करलो
या हल्की सी डकैती
हिम्मत हो तो करके देखो
गुर्दे चाहिए सख्त
थोड़ी सी भी इधर उधर पर
तिहाड़ में डाले जाते
देश तोड़ने की मंशा में
बस घर पर नजरबंदी करवाते
जज साब भी बड़े जज्बे में
कुछ कुछ शब्द पिरोते
डिसेंट, सेफ्टी वॉल्व, प्रेशर कुकर
करके कुछ कुछ ज्ञान परोसते
जजवाणी सुनकर कई
फिस्सडी चैनलों जागे
यौवन का जैसे घड़ा फूटा हो
ऐसे दीदे फाड़े
इन सब हालातों में
कई आत्माएं हैं बड़ी दुखी
कुछ को भैया सच बोलूं तो
इमरजेंसी की आस जगी
तब कैसे संपादक को झुकने बोला
वो रेंगते हुये से आये
फन के फन को भूलकर
फैन बन गये सारे
आज की इमरजेंसी
वाकई बड़ी हसीन
भर भर बाल्टी गालियों की
हर घंटेे दो फेंक
कुछ भी लेकर तोड़ मोड़कर
मोदी तक ले जाओ
इन मित्रों को वो घास ना डाले
कैसे त्रस्त कराये
आपातकाल के मंत्र का
जाप निरंतर चालू
पर असलियत से दूर सजी
झूठी झांकी सारी
सेकुलरिज्म के मॉल में
लगी इंटेलेकटुअल की सैल
फाल्स हुड के हैम्पर पर
पोस्ट ट्रुथ हैं फ्री
बुड़बक बड़े बकबकी
बकलोली करते जाये
थोड़ी देर मैं कविराय का
ऊपरी माला जोर जोर भन्नाए
कलम नही की बोराये कवि
देदे जरा विश्राम
कीबोर्ड पे करते उंगली
शब्द क्षरंखलित होते जाए
अब खड़ी उंगली भी
कर रही इशारे कई
कल परसों भी चलनी हैं
जल्दी कर दो ब्रेक




30 अगस्त 2018

शौरी साहब का दर्द

बन चकोर बीती उमरिया
चांद देखी हर दिन दुपहरिया
मन शंकित एक रोज भयो
चांद पे मोहे मन डसयो
दाग गड्ढे धुंधले से
पूरे पूरे साफ भये
चकोर प्रेम का बंधन टूटा
रो रो सारे रिश्ता फूटा
आंख साफ भई या
काई जमी
चांद छोड़ उल्कायें दिखी
अब मन पिंडों में उलझा
सुलझा मन भूत बन लटका




3 सितंबर 2018

इंटेलेकटुअल अनलिमिटेड

सेकुलरिज्म के मॉल में
लगी इंटेलेकटुअल की सैल
फाल्स हुड के हैम्पर पर
पोस्ट ट्रुथ हैं फ्री
बुड़बक बड़े बकबकी
चैटिंग करते जाये
थोड़ी देर मैं ऊपरी माला
जोर जोर भन्नाए



23 अगस्त 2018 

लीनचिस्तान का मायाजाल

अब तो जुबानी दही जमा के बैठी हैं
आँख पथरा जाएंगी खबरें ज़िक्र इंतेजार में
खून के रंग में तब्दीली हो गई हैं
बात खून की करने वालो का ख़ून भी ठंडा हो चला हैं
खबरों और बातों में
गले रेतने का जिक्र कब होता हैं
जब मरने वाला केसरी नही होता हैं
केसरी को ख़ून का रंग ही समझते हैं
इसीलिये पानी सा बहा जमी हरी करते हैं
प्रधान मुख से कुछ बोल तो निकले
संवेदना नही तो निंदा के शब्द ही फूटे
कर्ण आतुर हैं आहट क्यो नही
मन आहत तिरिस्कार क्यों हैं




20 अगस्त 2018

युवराज का विदेश भ्रमण

कुछ समुंदर पार कर
युवराज इतराये
श्रोता सामने देख कर
बक बक करते जाये
नौकरी और आतंक में
सामंजस्य बैठाए
Isis से जुड़ने वालो को
बेरोजगार बतलाये
देश में जब नही बनी
आलू से सोने की चक्की
ठेला लेके कोला बेचो
बोल के नाम शिकंजी
बातों का बेड़ागर्क हुआ
तो लिपट के गले पड़ जाओ
सीट पे वापस पहुच कर
आँख को मस्त मचकाओ
पूछने वाला कोई नही
क्यों बेल पर हो भाई
कोशिश जबरन जारी रखो
कोई बोफोर्स मिल जाये
हर मुद्दा तो ऐसा मुद्दा
जैसे अभी हुआ हो
तुम्हरे राज्य में जैसे
सबको सुर्खाब के पंख लगा हो
गालो पे पड़ते गड्ढो के
दीवाने करते चर्चे
अमेठी की सड़कों के गड्ढे
सस्ते से भी सस्ता
मसखरी से प्रसिद्धि
का रास्ता चुना हैं अच्छा
वोटर भैया ध्यान यह रखना
मजाक बड़ा है महंगा
मजे मजे में तुमने जो
उल्टा बटन दबाया
अगले एक दो दशकों को
कूड़ा हो जाना हैं पक्का
हैं शिकवे बड़े यह
बात कही हैं सच्ची
पर बुद्धि का नाश करके
दुर्दिन क्यो हैं चुनना
ईंट ईंट जुड़ रही काई सिमट रही
जंग बड़ी गहरी घुसी
वक्त के साथ
मिट रही
पथ में बड़े अवरोध हैं
संयम से संतुलन साधना
स्वप्न यथार्त बनेंगे
मन में आत्मविश्वास बाँधना
अभी घट रही घटनाओं पर
तर्कपरक परख करो
त्रुटिहीन सबकुछ चले
यह ढकोसला न रहे
मसखरे की मसखरी का
हार्दिक आनंद उठाओ
मुफ्त में हो रहे मनोरंजन के
मजे लो हास्य पाओ




10 अगस्त 2018

ट्रॉल्लिंग से इतर

इन ख्वाहिशों में

यह जिंदगी न जला

वो उनकी कहानियों

से दिल न लगा

यह आशिकों के 

खेल हैं ग़ालिब

उनको रूठने को 

मौका न समझ

वो कल रूठे

आज साथ हैं

वो कल फिर 

रूठेंगे ये मान ले ज़ालिम



10 अगस्त 2018

कभी कश्मीर में पंडित भी थे

जब उन्नासी मैं

घाटी के पंडित क़त्ल हुऐ

तब आवाज उठाने वालों के

मुँह में ताले बड़े पड़े

रहना उनको भी था बस्ती में

पर अरमान मसल के रख दिये।

एक बार आपकी क़लम से

कुछ किस्से उनके भी आते

शहर में तब मुहब्बत के

चिनार बड़े मेहताब लगते


18 जुलाई 2018

कांग्रेस, इतिहास और परिहास

कांग्रेस खड़ी
लकीरों से घिरी
लकीरें गाढ़ी
खाई बनी
खाई में बड़ी
गाद भरी
सडांध दूर दूर तक
फैले और इतराये
हर दल में
थोड़ी कम
थोड़ी ज्यादा
कांग्रेसी बास समाये
पंक्ति के अंत
तक पहुचने की बात
लकीरों से भिड़ कर
दम तोड़ती जाये
सिमटता आधार
वर्गो में बटा
बचे हुऐ का
अनवरत बँटाघार
कभी जनेऊ की लकीर
कभी टोपियों का खेल
हर मौसम में बदलता
विचारधारा का वेग
भरा लोकतंत्र पर
प्रहार करने का दंभ
सुरम्य स्थानो से
लड़ने का भ्रम
इतिहास के पन्नों
मैं भी उत्कीर्ण कई रेखाएं
गहरी छाप छोड़कर
मिटती नही रोशनाई
कश्मीर से कन्याकुमारी
रक्तरंजित लकीरें
देती यह संदेश
बस अब बहुत हुआ
खेल खत्म करो
कांग्रेस को इतिहास में दफन करो




18 जुलाई 2018

दिल्ली वाले सोफा संत

सोफा संत करे द्वंद
गिरे धन्न
सोफा सन्न
फोम हो गया चिंगम
चिपक तन
नो मूवमेंट
तोंद तोड़ती
बटन बंध
चाटू चाटे चटपट
समोसे झट
बिल भिल्लड़
भरे इंद्रप्रस्थ
झाड़ू पड़ी
अनयुसेड खड़ी
जाले पड़े
भूत लगे
छितराई तिनके पड़े
वाई फाई एंटेना बने
लो परसाद ग्रहण कर लो
घर पे एंटरटेनमेंट रिसीव
कर लो




15 जुलाई 2018

केजरी ऑन सोफा प्रोटेस्ट


केजरी लेटा सोफा पर
पाव पूरे पसराये
ऎसी चले धपक धपक
दिल्ली आंसू बहाये
काम करे न काज करे
मंत्री मंडल वही पसरे
दिल्ली मैं जो काम पड़ा हैं
वोह अपनी किस्मत रोये
मोदी मोदी नाम जपत हैं
केजरी सुध बुध खोय
मति फिरी जो वोट दिया
अब झाड़ू पर हैं सोये
पांच साल विकराल बड़े
नौटंकी मैं खोये
हर सुबह दिल्ली सहमी
ट्विटर का मुँह ताके
कौन नहीं फुलझरिया लेके
केजरी पूरा दिन साधे
केजरी दरबार मैं
भूत भरे हैं भारी
एक एक कर निकल रहे
नौटँकी हैं चालू
फिर केजरी बैठा सोफे पर
वादे दिए लटकाये
जाको जितनो चाहिए
वाई फाई साथ मैं लाये
डाउनलोड करलो उनको
फोल्डर रख सजाओं
पूरे होते कुछ नहीं
जंक ही डिजिटल बना
केजरी दरबार मैं
भूत भरे हैं भारी
तर्कों पर कुतर्क छोड़कर
करते नौटँकी सारी
सुन साधो बिन मांगी
सीख दिए कबीरा
काम काज कछु कर ले मोड़ा
दिन बहुरेंगे थोडा
लटकी झाड़ू पेड़ से
सीक सीक छितराये
एक एक ले जाओ घर पे
वाई फाई चल जाये
झाड़ू वाला लेकर बैठा
तिनके उसके खोले
एक एक तिनका देकर
देखो क्या क्या बोले
मुझसे कपटी धूर्त कोई ना
में सबका मामा हूँ
झूठ बोलना मेरा पेशा
में झूठ की खाला हूँ
नई राजनीति का नारा
में पेड़ पर चढ़कर बोला
बच्चो की कसमो को मैंने
चना समझ कर तोड़ा
झूठ बोलने में नही हैं
मेरा ब्रह्मांड में जोड़
ठग्गू के लड्डू भी
मेरे सामने गोल
झूठो की बारिश मुझको
लगती बहुत हैं प्यारी
हर बार के झूठ से
बढ़ती चंदे की थाली
मेरे झूठ की चादर बिछी हैं
शामियाना तना हैं बुलंद
किलबिलाती मेरे अंदर
माफी मांगने की हूक
अब माफी का फ़र्रा लेके
में बैठा चोराहे
जिसको जितनी चाहिये
थोक में वो ले जाये
यह सारी नौटंकी मेरी
नई नोटंकी का आगाज़
आगे आगे देखिये
मेरी पेशकश खास
नया पैंतरा मैंने सीखा
बेच के अपनी साख
मुझसे बड़ा न कोई ढ़ोंगी
गांठ बाँधलो ये बात



17 जुलाई 2018

छोटा जीवन छोटी झांखी

अपने छोटे से जीवन में
कई आंधिया देखी हैं
आंधियो के बाद रेत
फैलती देखी हैं
बदलावों के पड़ाव
आंधियो से नही आते
बस छड़ भर मैं सब बदलने
वाले लोग नही देखे
जब अकस्मात् से
कई भंवर बन जाते हैं
चक्रव्यूह के चक्र
धरा पे रच जाते हैं
अर्जुन या अभिमन्यु क्या
बनना हैं बोलो
अभिमन्यु बनकर तो
बस तुमको वीरगति होना हैं
लक्ष्य अगर तेरा
चक्रव्यूह का मर्दन हैं
कोई उपाय नही केवल
तुझको अर्जुन होना हैं
इस कुरुक्षेत्र में
युद्ध ही अंतिम सच हैं
अस्तित्व की रक्षा में
धूलधूसरित होना है
प्रश्न गंभीर मुँह बाये
खड़े होंगे
हर प्रश्न पर प्रतिक्रिया देने से
नये प्रश्न अंकुरित होंगे
संचय और भ्रम
इस पथ पर
साथ के पथिक होंगे
किसको कंधो पे लेकर
तुम लक्ष्य प्राप्त करोगे
किंतु परंतु की अठखेलियाँ
मन विचलित कर देती
लक्षभेदने की उत्सुकता
एकाग्रता भंग कर देती
त्वरित समाधान किसी विषय का
ऐसे ही नही हो जाता
समयबद्ध व्यवस्था मैं
एकाकी कुंठित हो जाता
शक्तिक्षरण न हो
ये विचार सर्वविदित हो
अपने अपने खंडित
स्वप्नों पर पुनःविचार तो हो
खंडित हृदय किस बात पर
रुष्ट कोपभवन बैठा
आगुन्तक ऐसे न चुने
लाक्षागृह बन जाये
पांडव तो बच निकले
स्वयं भस्म न हो जाये
शक्ति श्रृंखला अनवरत रहे
यह प्रयास श्रेष्ठ हो
पौधा अभी नवीन हैं
धरा पर पकड़ बनाएगा
संचित निष्ठा से होता रहा
वटवृक्ष बनता जाएगा
वंशों का गठन
अकस्मात घटना नही होता
इतिहास के पृष्ठों में
उत्कीर्ण हर कोई नही होता
सतत साधना गंभीर प्रयास
आधारशिला होंगे
रामराज्य का दिव्यस्वप्न
निश्चित पूर्ण होंगे



15 जून 2018

लेख से कविता बनी: सनातनी हिन्दू विस्मित विचलित सा

आशीष धर जी ने कुछ दिन पहले फेसबुक में एक लेख लिखा था जिसमे आह्वाहन था संकल्प लेने का - अपने भविष्य को बचाने के लिए वर्तमान में कर्म करने होंगे।

उनके लेख से प्रभावित होकर मुझे लगा इसको मुझे हिंदी कविता के रूप में रूपांतरित करना चाहिए।

मेरा प्रयास आपके विचारार्थ प्रस्तुत हैं ।

संकल्प ले  - अपने भविष्य को बचाने के लिए वर्तमान में कर्म करने होंगे।


सनातनी हिन्दू विस्मित विचलित सा ।
खड़ा हुआ ठगा हुआ ।।

शताब्दियों की दासता की बेड़ियाँ में जकड़ा हुआ ।
मन तन अवचेतन ।।

कभी तुर्क कभी मंगोल कभी मुगल ।
कभी बरतानी, कभी फ्रांसीसी कभी पुर्तगाली ।।

बंधनो से स्वतंत्र हो कर भी पराधीन स्वप्न से घिरा हुआ ।
खड़ा चौराहे पर सनातनी ।।

प्रताड़ित सोच उसका अस्तित्व ।
पिछड़ा बोलकर खड़ा पीछे किया ।।

फिर खींचते उसको हैं क्यों उलझे भविष्य में ।
ठगा से बुझा सा खड़ा चौराहे पर सनातनी ।।

कभी सोच में भी यह विचार आया नही ।
करना राज हमको इस धारा पे हैं ।।

गुजरे हुये रास्तो में कलियुग के विराम आये हैं ।
जहा भयानक, कुछ एहसास पाये हैं ।।

हम जुड़ रहे हैं उनसे जो खत्म कर देंगे ।
अपनी आकाशगंगा में अपने को ही भस्म कर देंगे ।।

खड़ा उस - इस काल की देहलीज पर सनातनी ।
वही सहमा डरा विस्मित सनातनी ।।

देते नव नवीन निर्मित संगठन ।
ज्ञान के चिथड़े कुछ ।।

सम्हाल धरा अपनी सावधानी से ।
ओ सनातनी ।।

शौक शिकार का इतना नही था जिसे ।
उसे बता रहे बचाने बाघ हैं ।।

पेड़ काट मत कर न बेरहमी ।
जता रहे उसको जो चिपके पेड़ से ।।

ज्ञान की रेतीली बौछार में ।
खड़ा सुन रहा आंख बंद कर सनातनी ।।

धरा पर भरपूर बिखरे हर रंग को ।
निहारता आया हैं पथिक सनातनी ।।

घने जंगलों कलकल नदियों ।
दूब ढकी चट्टानों के मध्य अठखेलिया खेलता था सनातनी ।।

जल जीवन हैं मानकर सहेजता था सनातनी ।
आज गंगा में धुल रहे चमड़ों और घुल रहे जहर से भुझा खड़ा हैं सनातनी ।।

देखकर पिंजर को गंगा में ।
भभक उठता हैं चौराहे पर सनातनी ।।

जुग सहस्त्र योजन पर भानु ।।
गद्य और पद्ध में लिखे हुये हैं ।
विज्ञान और गणित के मर्म ।।
सोच सनातनी विस्मित हैं ।
क्यों हो रहे वर्तमान में थोथे प्रसंग ।।

छिड़ी प्रतियोगिता कूपमंडूको में ।
की निंदक पद्ध किसका हैं प्रासंगिक ।।

संस्कृत की व्यवहारिकता पर उठता शोर कर्कश हैं ।
बाल मन पे प्रभाव क्या होगा यह अदभुत हैं
क्रोध उबलता सनातनी सन्न हैं ।
प्रश्न की उपयोगिता पर दंग हैं ।।

सोच यह विरोधाभास खड़ा चौराहे पर ।
संचय मैं मग्न हैं वो सनातनी ।।

हे राम बोलकर धरती से प्रस्थान किया बहुतो ने ।
राम नाम सत्य हैं बोलकर फूकते श्मशान में ।।

अब बहस करते भगवान् के अस्तित्व पे ।
बड़ी हिम्मत से लड़ रहे राम न्याय से  ।।

जिस नाम की माला जापे जापे ।
हिन्द महासागर के वासी ।।

जम्बूद्वीप से सुमात्रा तक प्रभाव उसका छाया ।
कृष्ण राम शिव पर काली छाया का साया ।।

कैसा घोर अंधियारा का ग्रहड़ लगा नाम पर ।
राम को ही खड़ा करा कठघरे में आनकर ।।

लौकिक है या अलौकिक इसकी बहस नही हैं ।
शून्य से अनंत उसका प्रभाव यही है ।।

अपने भगवानो के भग्नावशेष समेटे ।
खड़ा सनातनी चौराहे पे फिर लिए आस के झोले ।।

नालंदा की आग तीन मास जली थी ।
पर उस आग में ज्ञान की चिता जली थी ।।

बख्तियार खिलजी अनपढ़ था और औरंगजेब सयाना ।
वंशज और पूजक इनके अब भारत के टुकड़े करवाते ।।

गुरुकुल मैं विद्या अर्जन करके विद्वान बन जाते ।
यवनी चीनी मलय भिन्न भिन्न विषयों को चुनते ।।

अबके कुछ बिगड़े तो बेच दे अपनी माता ।
विश्विद्यालय बन रहे गद्दारों के अड्डे ।।

फिर इसी यक्ष प्रश्न से घिरा हुआ हैं वो ।
सोच रहा बिन साधना के विद्या धन मिल जाता ।।

सोच के इस भंवरजाल में फ़सा रहा अवचेतन ।
खड़ा सनातनी चौराहे पे फिर लिए मन भारी ।।

श्याम वर्ण में सजे हमारे बाँके कृष्ण मुरारी ।
उनके भक्तों पर लगते आरोप बड़े बेमानी ।।

सनातनी को बना दिया सर्वोच्च महा शाक्तिशाली ।
लगा दिये आरोप उसपर रंगभेद के सारे ।।

सनातनी शक्तिविहीन क्या समझे ये खेल ।
हिटलर सा बता दिया करके यह मेल बड़ा बेमेल ।।

सारे नये समतावादी खंडित कर रहे परंपरा ।
जो नही सनातनी का वो कर रहे हैं उसका ।।

सोच और विचारों में कही भक्त का रंग नही हैं ।
इस नगण्य को जोड़ रहे भगवन के आशीषों से ।।

हर रंग में रंगा सनातनी खड़ा उसी चौराहे पर ।
बेरंग हो गया उसका चोला आरोपो की साज़िश मैं ।।

आर्यावर्त के वासी पर भार पड़ा हैं भारी ।
उसको ये साबित करना हैं वो हैं कल्पवासी ।।

संजय रूपी भेष में घूम रहे चोले वाले ।
कर रहे पंथ परिवर्तन, देके झांसे और कहानी  ।।

झूठ की जड़ अब बढ़कर सर्पबेल हो गई ।
उज्ज्वल इस धरा को विषसंचित कर रही ।।

सनातनी के इतिहासों को मिथ्या बोल दिया ।
सर पे उसके शरणार्थी का लेप पोत दिया ।।

इन कुटिल कुकृत्यो से छलनी हो गया सनातनी ।
रिसते घावों को समेटता लड़ता रहा सनातनी ।।

गार्गी मैत्रीय लोपमुद्रा अपाला घोषा ।
लक्ष्मीबाई जीजाबाई चिन्नपा नाम बड़े इतिहासी ।
जिनके ज्ञान शौर्ये के वर्णन बड़े प्रेरणकारी ।।

जब तनो पर वस्त्रों के बोझ बहुत नही थे ।
पर मनुष्य की आंखों में लज्जा बहुत बड़ी थी ।।

उन्मादी अत्याचारी व्यभिचार लेकर आये ।
लज्जा कही दूर हटा कर वासना दिखाई ।।

वक्षो को कम ढ़का देखकर ।
बिन क़ासिम जैसे भौचक्के ।।

थोप दिए कानून रिवाज़ ।
जो रेत के ढेर में पनपे ।।

सर ढ़ककर अब महिलाओं की ।
हिमायती बड़ी मिलती हैं ।। 

काले कपड़े में लिपटकर ।
बड़े प्रवर्चन बकती हैं ।।

देख सनातनी क्या था तू क्या तू हो रहा हैं ।
इसी प्रश्नों के चक्रव्यूह में घिरा पड़ा हुआ हैं ।।

फिर सनातनी चौराहे पे खड़ा हुआ हैं ।
अब उसका तन भी संपूर्ण ढ़का छुपा पड़ा हैं ।।

गौतम ने न्यायदर्शन मैं लिखे शास्त्रार्थ के नियम ।
गार्गी - यज्वल्य शंकर - मिश्र मध्य हुए ज्ञान मंथन चरम ।।

परस्पर स्पर्धा का धेय था सत्य की खोज ।
किसी पक्ष को नही था अपने प्राणों का संकट ।।

भग्नवशेषित विरासत खड़ी धर्म की नींव पर ।
संचित सींची परिष्कृत हैं तर्कों की विधाओ से ।।

अब सनातनी श्रापित हैं वर्तमान के कोलाहल में ।
उसको बता रहे क्यो उसका मत बेमानी हैं ।।

सहनशीलता की परिभाषा उसके गले फसाई हैं ।
जिसकी वाणी कई बरसों से धीमी और घबराई हैं ।।

सहन कर रहा सनातनी हर तीर, जो उसको भेदे हैं ।
उपहासों के झंझावर्त में वो निष्क्रिय और अकेले हैं ।।
मुक्त स्वर सबका सुन गूंगा बना हैं सनातनी ।
अपनी सीधी बातों को रखने से डरता सनातनी ।।

तर्कों को अपने हृदय के अंधियारे में छुपाये ।
प्राण प्रतिष्ठा रक्षित हित पूर्ण खड़ा सनातनी ।।

शाक्ति की महिमा जान कर कुछ लोग सयाने हो गए ।
सत्य असत्य ज्ञान तर्क शाक्ति सम्मुख नतमस्तक ।।

यह युक्ति समझ परे हैं, सनातनी से शायद ।
इसीलिये वो फ़सा पड़ा, मध्यमार्ग का कायल ।।

कब तक वाणी को अपनी, मद्धिम स्वर का रखोगे ।
अपने मंदिर अपने भगवन, को कब मुक्त करवाओगे ।।

कब तक अपनी व्यथा को कथा बनाओगे ।
कब अपने कर्तव्यों का निर्वाह कराओगे ।।

सत्य सुनाओ सत्ता को उनकी निंद्रा तोड़ो ।
भटके बजरंगी के जामवंत बन जाओ ।।

स्मरण रहे क्या दिनकर के कथन थे ।
मत भूलो गीतोपदेश जिसमे सत्य सारगर्भित हैं ।।

सहनशीलता, क्षमा, दया को, तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके, पीछे जब जगमग है ।।

कर्मो की श्रृंखला में पूर्ण विराम न आये ।
फल की इच्छा से कर्म न कही बंध जाये ।।

ओ सनातनी तेरे ऊपर संस्कृति आश्रित हैं ।
पुरातन पूज्य इस भूमि का तू ही उत्तराधिकारी हैं ।।

भगीरथ प्रयत्न करने पर गंगा आएगी ।
अपने पुरखों की धरती की तब जय कहलाएगी ।।



11 जून 2018

जोम्बी कथा

जोम्बी बन जो फिरे
रहे न काबू कोय

कोई उठाय कार्डबोर्ड
गलत सलत बौराये

इच्छा मन मे रहे
कई हिलोरे खाये

हिन्दू को कैसे डसे
मौका कोई न जाये

वीर्यवान गुब्बारा भयो
फूटे तरुणी के सर

दिव्यदृष्टि सो भांप लियो
हिन्दू को ये काम

भगवा रहित भूमि पर
खून बह रहो लाल

सनातनी सोचे खड़ो
झटकों या हलाल



19 अप्रैल 2018