Monday, August 2, 2021

पहरे

कैसे पहरे हो गये हैं
मिलना तो मुश्किल
बात करने पर ही पाबंदी है
दुनिया को बेवजह 
क्यों कानून बनाने हैं
हर चीज पर अब नजर बहुत हैं

मेरे पीने पर सवार

यूँ ना मेरे थोड़े ज्यादा पीने पर तू सवाल कर
मेरे कदम नही भटकेंगे इतना एतबार कर
तेरी सूरत के नशे से हो सकता हैं में लड़खाऊ
पर मेरी नजरो पर तु पूरा एतबार रख

जाएंगे जब देखा जाएगा
तू कुछ सफर तो साथ चल
में मुसाफिर हूँ बड़े ईमान का
तू कुछ कदम तो साथ चल

कुछ कोशिश करे

इतना सस्ता रिश्ता नही हैं तेरा मेरा
दिलों का मिलन हैं
कुछ तुझमे अच्छा है बहुत
कुछ मुझमे कम है
कभी मुझको तू पूरा करे
कभी में कोशिश करूँ

मेरी कोशिश हैं की बस में कुछ कर पाऊं
तेरे होंठों पर कुछ थोड़ी सी ज्यादा
हँसी कर पाऊँ
जब तक हैं मुमकिन ये करूंगा
डरता हूँ तुझे आदत न हो जाये

बात खो गई

जो बात थी वो तो कही खो गई
बस कुछ फिजूल की बात बातों में उलझे रहे

यू तो बस बात ही थी पर नश्तर सी चुभ गई
बस हम यू ही दर्द छुपाते रहे

ऐसा क्या है की मेरे नसीब में लिखा है
बिखरे कांच ही आये मेरे हिस्से में

पी कर चला गया मयखाने से वो
दो बूंद भी वो साथ पी ना सका

इतने मजबूर थे वो यू तन्हाई में भी
मुझे बोझ बताकर चले गये

ये सही है और उन्होंने सही भी किया
मुझे मेरी औकात और हैसियत बता कर चले गए

खुशबू सी तेरी याद

तुम्हारी वो याद खुशबू की
अभी भी बिल्कुल ताजा हैं
थोड़ी उलझी सी सिमट गई है
पर बिल्कुल वही हैं
आज ऐसे ही दराज 
मैं से निकल आयी
वापस रखने का
दिल नही किया
सोचा की क्या धो डालें इसे
फिर ना जाने क्या सोचकर
उसे खुद ही पहन लिया
अब लगता हैं तुम यही तो हो
यु ही बस दिल पर बस पड़ी तो हो

क्या कहना है

कुछ हैं जो दिल के किसी कोने में
सिमटा से पड़ा हैं
उसको कुछ कहना है पर
समझ ही नहीं आ रहा क्या कहना है
जो हैं वो कुहासे से सा हैं
न गहरा हैं ना हल्का हैं
कही कुछ कम हैं शायद
शायद इसीलिए हैं
कुछ हैं जो दिल में
मुड़ा तुड़ा पड़ा हैं

समुंदर की आस

दिल लगा होता तो कोई बात होती
तेरे शब्दों की मार दिल के पार होती
तू भी किनारें की तलाश में
में बैठा समुन्दर की आस मैं

ये अल्फाज यूं ही नही निकल जाते
बड़े जजपात लगते हैं इन्हें तराशने में
बेमतलब के गुनाहो की सजा मुझे क्यों  मिली
मेरे हिस्से में तेरी बारिश क्यों नही थी

ये हर रात को तेरी ख्वाहिशों के हिसाब  होते है
हर रात मेरी मजबूरी की नुमाइश होती हैं

कितना यकीन तुझे में दिला भी दूं
पर तेरी ही हर बात कायम होती हैं