Monday, August 2, 2021

समुंदर की आस

दिल लगा होता तो कोई बात होती
तेरे शब्दों की मार दिल के पार होती
तू भी किनारें की तलाश में
में बैठा समुन्दर की आस मैं

ये अल्फाज यूं ही नही निकल जाते
बड़े जजपात लगते हैं इन्हें तराशने में
बेमतलब के गुनाहो की सजा मुझे क्यों  मिली
मेरे हिस्से में तेरी बारिश क्यों नही थी

ये हर रात को तेरी ख्वाहिशों के हिसाब  होते है
हर रात मेरी मजबूरी की नुमाइश होती हैं

कितना यकीन तुझे में दिला भी दूं
पर तेरी ही हर बात कायम होती हैं

बेचैन अधूरापन

दिल बस में नही
बेचैन हैं
चाह रहा हैं सब छोड़ दे
पता नही छोड़कर क्या करे
जो हैं वो क्या हैं
जो नही हैं वो क्या अपना हैं

अगर पायल होती


वो हल्के से तू उछली तो लगा
घुंगरू झनक गये
अगर पैरो में पायल होती
तो खनक जाती

वो हाथोँ से कुछ मचलती लटों
तो हल्के से हटा देना
अगर फूलो की लड़ी होती
तो बिखर जाती

वो फिर हल्के से मुस्कुरा कर
हवा में हाथों से मिठ्ठी बनाना
अगर सामने दिल होता तो
कैसे संभल पता

अपनी शरारतों पे फिर 
तेरा अंत में शर्मा जाना 
वो होंठो से शर्मीली 
हँसी का रह जाना

तुझे यूँ देखकर मन पर काबू नहीं रहता
तेरे पास आकर तुझे करीब से देखने की ललक
कुछ है तेरे रूप के सागर मैं 
हद तोड़कर बाहों में भरने को आतुर

यूँ किश्तों में तेरा मिलना
प्यास मिलने की और बढ़ा देता हैं
करते हैं शांत दिल को हम किसी तरह
पर हर बार हम दिल हार जाते हैं

Wednesday, February 10, 2021

एक टीस

एक टीस सी उठती हैं 
जब तेरी सिसकी सुनता हूँ
कुछ कर नही पाने की
खुद से नफरत होती हैं

सोचता यही हूँ
अगर तेरे पास होता
कुछ नही तो कम से कम
तेरे आंसू तो थाम लेता

क्यो तेरे पे गुजर रहे
हालातों का एहसास
मुझको होता हैं
तेरे दर्द से मेरा रिश्ता क्या है

कुछ हुआ है जो समझ नहीं आता
ये दर्द और ख़ुशी का रिश्ता क्या है

Wednesday, January 6, 2021

एकतरफा

माना की तेरी मोहब्बत
तब एकतरफ़ा थी
पर अब बंदिशों की 
गुंजाइशें कहा हैं

तू तब ठुकराए जाने के 
ख़ौफ़ में था
अब तो खौफ़ की गुंजाइशें 
कहा है

तू बात रख 
मन में मलाल मत रख
कभी तो तेरी दरख्वास्त 
मंजूर होगी

कई थे जो बस 
दिल में इश्क़ को जिंदा रखते थे
तुझे तो फिर भी काफी
नजदीकियां हासिल थी

वो दिन

वो दिन अब बस यादों के धुमिल गलियारों में
कही खो से रहे हैं
कुछ सिसकियां से कुछ बह के सूख गये
आंसुओ की लकीरों से
बस सिमटे हुए धीरे धीरे खत्म हो रहे है
लम्हों की खूबसूरत कड़ियों से बने चलचित्र मानिंद
रंगों के उड़ जाने की बाट जोह रहे हैं

फिर कब ठंडी हवा के सर्द झोंको से ठिठुरती
रात में धुएं उड़ाते उनको देखेंगे
फिर कब समुद्री हवा में घुली नमकीन
तासीर को बेपरवाह चखेंगे
फिर कब अलसाई सुबह में हल्की भूख
को कुछ बचा खाकर मिटायेंगे

कब हाथों में बिना झिझक मासूम चेहरे को
भर पाएंगे
एक हल्के छूने के एहसास से हुई सिरहन
को फिर महसूस कर पाएंगे

दिन तो बस कट ही रहे हैं की सब पहले 
जैसा हो जाये
इस खयाल को दिल में सम्हाले
अब कितने दिन और काटे जाएंगे

वो फिर

फिर ऐसे ही 
खयालो के झुरमुटों से 
तेरा चेहरा नजर आए

वो बोलती आंखे
वो होंठो पे उछलती हँसी
कुहासे मैं भी साफ दिखती है

वो हल्की हवा के साथ
माथे पर बाल बिखर आते हैं
हटाने को कुछ उंगलियां 
मचल जाती है

कोहरे की ओट में कुछ
पानी की बूंदे गालो पे उभरी हैं
ठंडे हाथों से समेट लेता हूँ

भर लिया हैं चेहरे को 
हथेलियों में
कोहरा गहरा हो चला हैं
 
थोड़ी सहम गई हैं 
ठंडे हाथ गुनगुने गालो 
को लगते ही

आंखे अधखुली हैं
थोडी बंद हो रही हैं
साँसे गर्म टकरा कर 
कोहरा पिघला रही हैं

होंठो को बांधना है
सुर्ख नही कुछ कम हैं
पर जल रहे हैं

कोहरा ठहर कर
क्या देख रहा हैं

हल्की ठंड थोड़ी बढ़ी हैं
सुर्ख रंग थोड़ा जमा है
आंख अभी पूरी बंद हैं

वो हथेलियां अब खाली हैं
वह चेहरा नही हैं
झुरमुटों में कुछ हलचल है
अब बस घना कोहरा बचा है